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नकद धन लेन-देन की सुरक्षा के लिए आपको चेक सुविधा दी गई है, लेकिन जानकारी के अभाव मेें अगर आपने इसका गलत इस्तेमाल किया, तो चेक बाउंस हो सकता है, जो एक दंडनीय अपराध है…

किसी भी व्यक्ति, कंपनी या संस्थान द्वारा आपको चेक दिया गया हो, लेकिन उनके खाते में चेक पर अंकित रकम जमा न हो, तो वह चेक बाउंस हो जाता है यानी बैंक द्वारा चेक वापस कर दिया जाएगा और आपको वह धन प्राप्त नहीं होगा। यह एक दंडनीय अपराध है। इसके अतिरिक्त चेक पर अंकित राशि बैंक में जमा राशि से कम हो या दिनांक लिखने में कोई गलती हो जाए, तो चेक वापस हो जाता है। यह दंडनीय अपराध की श्रेणी में नहीं आता।

०या करें- जब चेक हो जाए बाउंस?
चेक बाउंस होने पर सामान्य व्यावहारिकता के अनुसार आप चेक जारी करने वाले व्यक्ति, कंपनी या संस्थान को यह जानकारी देकर तत्काल दूसरा चेक जारी करने या नकद भुगतान का आग्रह कर सकती हैं, लेकिन उनके द्वारा आपको क्षमा याचना के साथ यथाशीघ्र चेक या धन न दिया जाए, तो आप उन पर कानूनी कार्यवाही कर सकती हैं। इसके तहत आपको कब, ०या करना है, जानिए-

चेक बाउंस की जानकारी मिलने के 4 माह के भीतर आप चेक भेजने वाले को साधारण पत्र द्वारा सूचित करें।
पत्र में आप 15 दिन के अंदर राशि भुगतान करने की चेतावनी दें।
यदि 15 दिनों के अंदर आपको राशि नहीं मिलती, तो आप 30 दिनों के अंदर थाने में एफ.आई.आर. दर्ज करवाएं। थाना कोर्ट को चालान भेजेगा।
चेक बाउंस होने की स्थिति में भारतीय बैंक संस्थान द्वारा निर्धारित सूचना पत्र लेकर आप नोटरी प३िलक के पास जाकर प्रोटेस्ट करवाएं तथा इसकी फोटोकॉपी चेक देने वाले को भेजें।
बैंक द्वारा अपर्याप्त राशि की सूचना-पत्र के आधार पर ही आप इस कानून की मदद ले सकती हैं।
पारक्रम भिलेख अधिनियम 881 की धारा 138 के अंतर्गत व्यक्ति पर कार्रवाई की जाएगी।
यह कार्रवाई आप चेक के वैधता समय के अंतर्गत ही करें।
दान या उपहार में मिले चेक बाउंस होने पर आप कार्रवाई नहीं कर सकते, ०योंकि यह दंडनीय अपराध के अंतर्गत नहीं आता है।
एक-दो पेशी में ही ऐसे केस का निर्णय सुना दिया जाता है। अत: व्यक्ति दोनों पेशी में उपस्थित नहीं होता, तो कोर्ट व्यक्ति के अनुपस्थिति में भी निर्णय दे सकता है।
शिकायत पत्र में जिस व्यक्ति ने चेक दिया, उसका नाम तथा कंपनी या संस्थान द्वारा दिया गया हो, तो उसके निदेशक का नाम उल्लेखित करें।
शिकायत दर्ज हो जाने के बाद आपको उसे सत्यापित (सच्चाई) करने वाली सभी जानकारी अदालत को देना होगी। उसके आधार पर ही न्यायिक दंडाधिकारी उनके खिलाफ सम्मन जारी करेगा।
राशि कब तक वापस मिल सकती है?
आपकी राशि वापस मिलने का समय मुकदमे की अवधि पर निर्भर करता है, लेकिन फिर भी, सामान्यत: छह माह से एक साल के भीतर राशि मिलने की संभावना रहती है।
सजा ०या?
चेक बाउंस होने पर जारी किए जाने वाले को अदालत द्वारा एक साल की कैद या चेक की राशि की दुगनी रकम या दोनों दंड दिया जा सकता है।

सरकार और विपक्ष ने अंतत: संसदीय परंपराओं के निर्वाह की जरूरत को समझ लिया और इसलिए अपनी- अपनी जिद छोड़ कर टकराव टालने पर राजी हो गए। जिस फार्मूले पर गतिरोध टालने का समझौता हुआ है उसके संकेत पिछले हफ्ते भाजपा नेताओं के गोवा रवाना होने से पहले मिलने लगे थे।

यह समझना मुश्किल नहीं था कि भारतीय जनता पार्टी संसदीय समितियों के बहिष्कार के अपने फैसले को बहुत दूर तक नहीं खींचेगी क्योंकि इससे नुकसान उसका ही होने वाला था। लेकिन उसे अपनी साख बचाने के लिए सुरक्षित रास्ता चाहिए था और वह सरकार ही मुहैया करा सकती थी।

इसलिए दोनों पक्षों के बीच गतिरोध टालने के लिए एक ऐतिहासिक फैसला हुआ और इसका श्रेय निश्चित रूप से लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी को दिया जाना चाहिए। भारत के संसदीय इतिहास में संभवत: यह पहला मौका होगा, जब लोकसभा अध्यक्ष की अनुमति के बाद पढ़े गए प्रस्ताव को संसदीय कार्यवाही से निकाला जाएगा।

बयान के किसी हिस्से या असंसदीय भाषा व शब्दों को संसदीय कार्यवाही से निकाला जाता रहा है लेकिन एक प्रस्ताव, जिससे अध्यक्ष सहमत हो, उसे विपक्ष के दबाव की वजह से कार्यवाही से निकाला जाए, ऐसा संभवत: पहली बार होगा।

लोकसभा में भाजपा के उपनेता विजय कुमार मल्होत्रा ने अध्यक्ष के खिलाफ जो कुछ कहा था उसे तो संसदीय कार्यवाही से निकाल ही दिया जाना चाहिए था क्योंकि उनका बयान सदन के अध्यक्ष के खिलाफ था।

लेकिन भाजपा ने मल्होत्रा के बयान की वापसी के बदले अध्यक्ष की अनुमति से पढ़े गए बयान को संसदीय कार्यवाही से निकालने का फैसला करा कर एक तरह से अपनी जीत और जिद दोनों दर्ज कराई है। इसके बरक्स कांग्रेस की विनम्रता और मजबूरी दोनों का अहसास हुआ है।

गतिरोध खत्म होने का फार्मूला निकल आने से तात्कालिक असर यह हुआ कि संसदीय समितियों का गठन शुरू हो गया। लेकिन इससे संसद के सुचारू संचालन की उम्मीद करना बेकार है क्योंकि विपक्ष दागी मंत्रियों के सवाल पर सरकार का विरोध जारी रखेगा।

शिबू सोरेन के इस्तीफे और उनकी गिरफ्तारी से विपक्ष के हौसले बुलंद हैं और उन्हें लगता है कि अगर उनका विरोध जारी रहा तो कम से कम बजट सत्र में तो वे इसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने में कामयाब हो जाएंगे। इसका लाभ उन्हें बिहार और झारखंड के विधानसभा चुनावों में मिल सकता है।

बहरहाल सरकार के झुकने से संसदीय गतिरोध खत्म तो हो गया है पर यह सवाल जरूर उठ खड़ा हुआ है कि क्या लोकसभा अध्यक्ष के सम्मान का ख्याल रखने की जिम्मेदारी सिर्फ सत्तापक्ष की है?

यह सोमनाथ चटर्जी का बड़प्पन है कि उन्होंने संसदीय सद्भाव बनाने और संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलाने के लिए विपक्ष द्वारा किए गए अपमानजनक बरताव को भुला दिया और अपनी अनुमति से पढ़े गए प्रस्ताव को भी संसदीय कार्यवाही से निकालने पर सहमत हो गए।

लेकिन भविष्य में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को पूरी जिम्मेदारी और गंभीरता से इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। और दूसरी बात यह कि दोनों पक्ष लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति की गरिमा का समान रूप से सम्मान करें और उसे बचाने की कोशिश करें।

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