Bust myths with reason

नया शिक्षा सत्र आरंभ हो चुका है। स्कूल, कालेज, सरकारी तथा निजी क्षेत्र के व्यावसायिक तथा परंपरागत पाठ्यक्रम वाले विश्वविद्यालयों में प्रवेश का कार्य भी पूरा हो चुका है। जहां कुछ छात्र एवं अभिभावक खुश हैं वहीं कुछ दुखी भी हैं।

कुछ को मनचाहा पाठ्यक्रम मिला, तो कुछ को नहीं। यह होना स्वाभाविक था क्योंकि शिक्षा जगत में अभी तक राज्य ने कोई अप्रत्याशित तैयारी तो की नहीं है, जिससे देश में बढ़ती हुई छात्र- छात्राओं की संख्या को उनकी चाहत के अनुसार उनके राज्य या शहर ही में पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल जाता।

शिक्षा पर सरकार आज तक हर वर्ष सिर्फ जीडीपी का 3.6 प्रतिशत ही खर्च करती आई है। इसलिए हम शिक्षा जगत में राज्य एवं राष्टï्रीय स्तर पर मूलभूत इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं उपलब्ध करा पाए हैं। हां आपरेशन ब्लैक बोर्ड से लेकर सर्वशिक्षा अभियान तक अनेक प्रयास किए गए, जिससे देश में साक्षरता दर तो बढ़ी है पर वास्तविक शिक्षा का स्तर एवं गुणवत्ता नहीं बढ़ी है।

आजादी के पश्चात हमारे राष्टï्र निर्माताओं ने शिक्षा को आत्मनिर्भर कारक माना था। समाज में शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार से ही सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। शिक्षा मात्र से ही नागरिकों का सशक्तिकरण किया जा सकता है।

कालांतर में राजनीतिक दलों ने स्वार्थवश शिक्षा को राजनीति का अखाड़ा बना दिया और अपनी विचारधारा के आधार पर इसका स्वरूप ही बदल दिया। शिक्षा के साथ राजनीतिक खिलवाड़ के अनेक बुरे प्रभाव सामने आए हैं- पहला यह कि सरकार अभी भी गुणवत्ता भरी प्रारंभिक शिक्षा जनमानस तक नहीं पहुंचा पाई है।

इसी कारण दोहरी शिक्षा पद्धति लागू हो गई। जहां ग्रामीण क्षेत्रों में एक शिक्षक तथा छत व ब्लैक बोर्ड विहीन स्कूलों की कतार खड़ी है वहीं शहरी क्षेत्र में कान्वेंट तथा अंग्रेजी माध्यम के निजी स्कूलों का विकास हुआ है।

परिणामत: समानता के बजाय ऐसी शिक्षा पद्धति ने समाज में और भी असमानता बढ़ा दी है। राजनीतिक विचारधारा के आधार पर पाठ्यपुस्तकों का निर्माण शिक्षा के साथ राजनीतिक खिलवाड़ का बुरा प्रभाव है।

राजग की अगुआई कर रही भाजपा ने पूर्व में एनसीईआरटी द्वारा संपादित करवाई गई पुस्तकों को यह कहकर खारिज कर दिया था कि इसमें वामपंथियों का दखल है। इसी सरकार ने जानबूझकर देश की उच्चतम शिक्षण संस्थाओं के प्रबंध को भी अपनी विचारधारा का जामा पहना दिया।

शिक्षा के भगवाकरण के इस खेल का सभी ने विरोध किया परंतु कुछ भी हासिल नहीं हुआ। समय बदला कांग्रेस के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी और फिर से एनसीईआरटी द्वारा संपादित करवाई गई पुस्तकों में फेरबदल किया जा रहा है।

इस प्रकरण में अब महामहिम राष्टï्रपति भी कूद पड़े हैं। अजीब विडंबना है भारतीय शिक्षा जगत की, जहां तथ्य नहीं राजनीतिक विचारधारा पाठ्यक्रमों का निर्धारण करती है। विद्यार्थियों के भविष्य के बारे में बिना सोचे-समझे राजनीतिक दल अपने राजनीतिक वर्चस्व के लिए संघर्ष को ज्यादा जरूरी समझते हैं।

राष्टï्रीय स्तर पर ही नहीं राज्यों के स्तर पर पाठ्यपुस्तकों में राजनीतिक विचारधारा के आधार पर बदलाव किए जाते हैं। और यह प्रक्रिया दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि सांस्कृतिक एवं प्रजातीय भिन्नता वाले इस देश में पाठ्यक्रम एवं पुस्तकें सभी वर्णों एवं वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करती हैं।

देश के सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सृजन के अनेक वर्षों, वर्णों एवं वर्गों के योगदान का संज्ञान नहीं लिया गया है। जैसे- जैसे ये वंचित वर्ग एवं वर्ण राजनीतिक सत्ता के करीब या सत्ता में आते हैं, वे अपने वर्ग या वर्ण का इतिहास भी पुस्तकों में शामिल करना चाहते हैं।

ऐसे में सवाल है कि क्या सरकार स्कूली पुस्तकों के माध्यम से साझी विरासत का तटस्थ पाठ्यक्रम तैयार करने की कोई ठोस नीति विकसित करेगी? शिक्षा का व्यवसायीकरण या शिक्षा को बाजार की खपत के लिए तैयार करना शिक्षा में राजनीति का एक अन्य दुष्प्रभाव है।

आज भारत में व्यावसायिक शिक्षा के लिए अंधी दौड़ मची हुई है। कंप्यूटर, प्रबंधन, विदेश व्यापार, फैशन डिजाइनिंग, होटल प्रबंधन, पर्यटन प्रबंधन, मास मीडिया, आदि अनेक व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की बाढ़ सी आ गई है।

बिना सोचे-समझे अभिभावक अपने बच्चों को देश में ही नहीं विदेश में इन पाठ्यक्रमों की शिक्षा लेने भेज रहे हैं। विचारणीय बिंदु यह है कि उपरोक्त पाठ्यक्रमों का प्रचलन भूमंडलीकरण, निजीकरण, सूचना क्रांति की प्रक्रिया के साथ हुआ है क्योंकि इन प्रक्रियाओं की वजह से भारत में आने वाली बहुराष्टï्रीय कंपनियों को व्यवसाय हेतु प्रशिक्षित श्रमिकों की जरूरत थी।

परंतु सरकार के पास इस प्रकार की संस्थाएं बहुत कम मात्रा में थीं या फिर थीं ही नहीं। अत: सरकार ने राजनीतिक विचारधारा के आधार पर पहले भूमंडलीकरण, निजीकरण जैसी प्रक्रिया को स्वीकार किया फिर उनकी आवश्यकताओं के आधार पर अपने देश की शिक्षा प्रणाली को भी बदल दिया।

शिक्षा जगत में इन राजनीतिक निर्णयों के परिणाम भारतीय समाज के लिए घातक हो सकते हैं। आज व्यावसायिक शिक्षा के दौड़ में पारंपरिक शिक्षा पीछे छूट गई है। व्यावसायिक विद्यालयों में जो शिक्षा दी जा रही है वह व्यक्ति को सिर्फ बाजार में नौकरी दिलाने में मदद कर सकती है।

इसमें पारंपरिक शिक्षा नदारद है, जिससे व्यक्ति सामाजिक आवश्यकताओं को भी पूरा करने में मदद पाता है। ये विद्यालय क्योंकि निजी क्षेत्र में हैं इसलिए ये मोटी फीस लेकर केवल मुनाफा कमाने में लगे हैं। सरकार इन व्यावसायिक पाठ्यक्रम वाले विद्यालयों से यह क्यों नहीं पूछती कि ये परंपरागत शिक्षा से अपना पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं?

चूंकि बाजार की मांग स्थायी नहीं होती अत: बाजार की विशिष्टï मांगों के आधार पर पाठ्यक्रमों को जल्दी-जल्दी बदलना पड़ सकता है। क्या सरकार एवं निजी क्षेत्र इसके लिए आर्थिक रूप से तैयार हैं? ऐसा लगता तो नहीं है। फिर इस पर वर्तमान में इतना व्यय क्यों? अगर इसे नहीं देखा गया तो कई विश्वविद्यालय एवं विद्यालयों के मालिक दिवालिया हो सकते हैं।

सामाजिकता पर बाजार को वरीयता देने से मूल्यों, नैतिकता, सामुदायिकता, परंपरा, पारिवारिक संबंधों का भी हृास होता है। इससे अनेक विसंगतियां पैदा होती हैं। इन्हीं कारणों से विकसित देशों में भी विसंगतियां पैदा हुई थीं।

जर्मनी का फासीवाद, अमेरिका का व्यक्तिवाद एवं हिप्पी संस्कृति या जापान में व्यावसायिकता के कारण परिवार का गायब होना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। भारत भी इसी रास्ते पर चलना चाहता है? अगर नहीं तो वर्तमान में पारंपरिक एवं व्यावसायिक शिक्षा का संतुलित विकास होना चाहिए।

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