दिलचस्प है गहनों का इतिहास

भारत में तो स्त्रियों की सबसे प्रिय चीज के रूप में ज्यूलरी विख्यात ही है, दूसरे देशों की स्त्रियों को भी यह कुछ कम प्रिय नहीं है। ज्यूलरी के रूप में अन्य देशों में भी विभिन्न प्रकार की धातुओं, नगों, पत्थरों और रत्नों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा जैसे हमारे भारतीय समाज में कुछ खास आदिवासी समुदायों की स्त्रियां कुछ विशेष लकडि़यों, जंतुओं की सींगों या चमड़े तथा सीप आदि की बनी ज्यूलरी पहनती हैं, वैसे ही दूसरे देशों में भी इन चीजों का प्रयोग विभिन्न रूपों में ज्यूलरी के तौर पर होता है।
दिलचस्प बात यह है कि कई देशों में अब इनका प्रयोग शहरी समाज में भी खूब प्रचलित हो गया है। खास तौर से पश्चिमी देशों की आधुनिक स्त्रियां इन्हें निस्संकोच पहनती हैं। इस लिहाज से देखें तो गहनों की डिजाइन और इनमें प्रयुक्त धातुओं से कहीं ज्यादा रोचक विभिन्न देशों में गहनों के प्रचलन का इतिहास है।
सबको पसंद है सोना
दुनिया भर की स्त्रियों को ज्यूलरी बेहद पसंद होने का कारण केवल इतना ही नहीं है कि यह उनकी सुंदरता और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाती है, बल्कि यह भी है कि इससे उन्हें आर्थिक सुरक्षा का एहसास होता है। भारत ही नहीं, दुनिया भर में अभी एक शताब्दी पहले तक परिवार की अर्थव्यवस्था की धुरी पुरुष हुआ करते थे। परिवार की चल-अचल संपदा पर तब केवल पुरुषों का ही अधिकार होता था। ऐसी स्थिति में स्त्री के लिए गहने ही एकमात्र मजबूत आर्थिक आधार हुआ करते थे।
शायद यही कारण है कि ज्यूलरी में सबसे ज्यादा लोकप्रियता सोने को मिली। भारत में तो ज्यूलरी में सोने का प्रयोग प्राचीन काल से ही होता आ रहा है। अजूबे पिरामिडों के लिए मशहूर देश इजिप्ट यानी मिस्त्र में इसकी शुरुआत पांच हजार साल पहले हो गई थी। पुरातात्विक प्रमाणों से जाहिर होता है कि उन दिनों सोने के ब्रेसलेट, पेंडेंट, नेकलेस, अंगूठियां, आर्मलेट आदि कई तरह के गहने बनाए जाते थे और ये सभी खूब प्रचलन में थे। उन दिनों यहां इनका प्रयोग सादे ढंग से होता था। सोने-चांदी के जेवरों पर डिजाइनों का प्रयोग यहां बहुत बाद में शुरू हुआ, बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में।
ग्रीस में डिजाइन
ग्रीस यानी यूनान में भी इनका चलन प्राचीन काल से है। करीब चार हजार साल पहले इन पर डिजाइन्स का प्रयोग शुरू हुआ और पहले जो डिजाइन बनीं वह समुद्री जंतुओं की थीं। फिर फूलों, पत्तियों, पेड़-पौधों, सुपारी व पान आदि की डिजाइनें भी जेवरों पर बनने लगीं। नगों का इस्तेमाल यहां करीब ढाई हजार साल पहले शुरू हुआ। रत्नों में यहां सबसे पहले पन्ने, मोती, एमेथिस्ट और गार्नेट का प्रयोग किया गया। ज्यूलरी के लिए सबसे शुद्ध सोने और अच्छी डिजाइन का प्रयोग पश्चिम में सबसे पहले इटली में शुरू हुआ। आज पेंडेंट भारत में भी खूब लोकप्रिय हैं, लेकिन मूल रूप से यह शायद इटली की देन हैं। अब से करीब ढाई हजार साल पहले इटली में ऐसे पेंडेंट बनने शुरू हुए जिनमें पहनने वाले परफ्यूम भर कर रखते थे। ज्यूलरी में मणियों और रत्नों का प्रयोग रोमन लोगों ने करीब दो हजार साल पहले शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने नीलम और पन्ने आदि का प्रयोग अपनी ज्यूलरी में सजावट के लिए शुरू किया। वैसे असली रत्न तब वहां नहीं मिलते थे। ये ची़जें वहां के व्यापारी पूरब से मंगाते थे। उन दिनों इटली के ही व्यापारी पूरे यूरोप में ज्यूलरी बेचते थे। हालांकि 13वीं सदी में वहां महंगे कपड़ों और ज्यूलरी पर टैक्स लगा दिया गया। इसके बाद वहीं सोने-चांदी के रंगों वाली नकली ज्यूलरी और भिन्न-भिन्न रंगों के बने नकली रत्नों का प्रयोग भी शुरू हुआ। उन दिनों इटली के व्यापारियों ने नकली जेवर बनाने की अपनी कला से दूसरे देशों के व्यापारियों को खूब ठगा भी। हालांकि बाद में 18वीं शताब्दी के दौरान नकली ज्यूलरी के कारोबार पर फ्रांस ने अपना अधिकार जमा लिया।
अफ्रीका में मिली माला
गहनों का सबसे दिलचस्प रूप है अफ्रीका में। पुराविदों के अनुसार दुनिया का सबसे पुराना जेवर दक्षिण अफ्रीका में ही पाया गया है। यहां स्थित पुरातत्व महत्व की ब्लॉम्बस गुफाओं में 75 हजार साल पुरानी एक माला पाई गई है। पुराविदों का अनुमान है कि घोंघे के 41 कवचों की बनी इस माला का इस्तेमाल गहने के रूप में किया जाता रहा होगा। मध्य पाषाण कालीन इस क्षेत्र की खुदाई के दौरान ऐसी ही कई और ची़जें मिलीं, जिनके बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि इनका प्रयोग उस समय ज्यूलरी के रूप में किया जाता रहा होगा। ब्लॉम्बस केव प्रोजेक्ट के निदेशक पुराविद क्रिस्टोफर हेंशिलवुड कहते हैं, यहां इस बात के भी तमाम प्रमाण उपलब्ध हैं कि मनुष्य खाने के लिए जिन जंतुओं का शिकार करते थे, उनका मांस खाने के बाद शरीर के शेष भागों का प्रयोग भी वे किसी न किसी रूप में कर डालते थे। इनमें कुछ जंतुओं के सींगों और हड्डियों का प्रयोग वे हथियार बनाने में करते थे तो कुछ के गहने बना डालते थे।
अब पूरी दुनिया में
वैसे सच तो यह है कि दक्षिण अफ्रीका में ज्यूलरी के लिए ऐसे प्रयोग आज तक होते चले आ रहे हैं। यहां आज भी आदिवासी क्षेत्रों के लोग ऐसे गहनों का प्रयोग खूब करते हैं। यही नहीं, अब तो शहरी क्षेत्रों के लोग भी इन गहनों का प्रयोग आम तौर पर करने लगे हैं। पाषाण काल में जब मनुष्य गुफाओं में रहता था, तब शुरू हुए इन गहनों की डिजाइन में भी समय के साथ-साथ बहुत विकास हुआ है। बाद में इन पर ग्रामीण दिलचस्प है गहनों का इतिहास भारत में तो स्त्रियों की सबसे प्रिय चीज के रूप में ज्यूलरी विख्यात ही है, दूसरे देशों की स्त्रियों को भी यह कुछ कम प्रिय नहीं है। ज्यूलरी के रूप में अन्य देशों में भी विभिन्न प्रकार की धातुओं, नगों, पत्थरों और रत्नों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा जैसे हमारे भारतीय समाज में कुछ खास आदिवासी समुदायों की स्त्रियां कुछ विशेष लकडि़यों, जंतुओं की सींगों या चमड़े तथा सीप आदि की बनी ज्यूलरी पहनती हैं, वैसे ही दूसरे देशों में भी इन चीजों का प्रयोग विभिन्न रूपों में ज्यूलरी के तौर पर होता है।
दिलचस्प बात यह है कि कई देशों में अब इनका प्रयोग शहरी समाज में भी खूब प्रचलित हो गया है। खास तौर से पश्चिमी देशों की आधुनिक स्त्रियां इन्हें निस्संकोच पहनती हैं। इस लिहाज से देखें तो गहनों की डिजाइन्स और इनमें प्रयुक्त धातुओं से कहीं ज्यादा रोचक विभिन्न देशों में गहनों के प्रचलन का इतिहास है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *