जोधा-अकबर की पहली झलक

आशुतोष गोवारीकर की रितिक-ऐश्वर्या अभिनीत ‘जोधा-अकबर’ के ट्रेलर ‘जब वी मेट’ के साथ दिखाए जा रहे हैं। पहली झलक से भव्यता, अतिरेक और सौंदर्य के भाव प्रकट होते हैं। यह भी स्पष्ट होता है कि फिल्म ग्लोबल मार्केट के लिए हॉलीवुड की फिल्मों के अंदाज में रची गई है और एक्शन की हल्की सी झलक में चीन के युद्ध कौशल की भी झलक मिलती है, गोयाकि निर्देशक पर ‘क्रोचिंग टाइगर’ का प्रभाव है। कुछ महिलाएं भी युद्धरत दिखी हैं। सबसे ज्यादा गौरतलब बात यह है कि मुगल-ए-आजम अकबर को धर्माधता से लड़ते दिखाया गया है।

ज्ञातव्य है कि अकबर ने हिंदुओं पर लगे जजिया कर को समाप्त किया था और सती प्रथा को प्रतिबंधित किया था। उन्होंने अपने दरबार में यह बात स्पष्ट की थी कि कोई भी प्रशासन धर्म के आधार पर नहीं चलाया जाना चाहिए वरन न्याय, समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांत पर चलाना चाहिए। महान सम्राट अशोक और अकबर में यह समानता रही कि दोनों ने ही अखंड भारत की कल्पना की थी। बहरहाल इस ट्रेलर में ऐश्वर्या राय अपने सुंदरतम रूप में नजर आ रही हैं और रितिक का चेहरा मुगल पारंपरिक चेहरा नहीं होते हुए भी चाल-ढाल में मुगलई मिजाज लिए नजर आ रहा है।

दरअसल आज की मनोरंजन मंडी में यह जरूरी नहीं कि आप विश्वसनीय या इतिहास सम्मत फिल्म बनाएं, बल्कि भव्य मनोरंजन गढ़ें, जो महंगी टिकट दरों पर खरा उतरें। सच तो यह है कि भारत में इतिहास प्रेरित फिल्में कभी भी इतिहास आधारित विश्वसनीय फिल्में नहीं लगीं। यहां तक कि भव्यतम सफल फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का भी इतिहास से कोई संबंध नहीं था। मुगल दरबार या हरम में कभी कोई अनारकली नहीं रही। फिर इतिहास की मान्यता प्राप्त पुस्तकों में भी तथ्यों के साथ कल्पना का समावेश होता है।

मनुष्य की कल्पनाशक्ति इतनी प्रबल है कि आंखों देखी घटना का वर्णन सुनाते हुए भी उसकी कल्पना कुछ जोड़ देती है या कुछ घटा लेती है। वह फोटोग्राफी की तरह जस का तस कभी प्रस्तुत नहीं कर सकता। यहां बात क्रिकेट मैच के आंखों देखे हाल की नहीं है, क्योंकि भारत में एक भी कुशल कंमेट्रीकार नहीं है। वे प्राय: क्या हुआ था या क्या होना चाहिए, का वर्णन करने में वर्तमान क्षण को खो देते हैं। अकिरा कुरोसोवा की फिल्म ‘रोशोमान’ में एक घटना के चार चश्मदीद गवाह चार संस्करण प्रस्तुत करते हैं।

यह संभव है कि इस फिल्म के प्रेम दृश्य तूफान खड़ा कर दें। केवल इसलिए नहीं कि बच्चन बहू रितिक के साथ ‘धूम-2’ के चुंबन दृश्य का मुगलई संस्करण तो प्रस्तुत नहीं कर रही है, बल्कि इसलिए भी कि यह मुगल राजपूत प्रेमकथा है। सच्चाई यह है कि चुंबन कालातीत और सब धर्मो के मानने वालों के लिए समान है। यह मनुष्य के प्रेम की अभिव्यक्ति है और इस पर हमें अपनी संकीर्णता नहीं लादनी चाहिए। यह फिल्म व्यावसायिक हुड़दंगियों को अवसर दे सकती है। ऐसे भी उन्हें अवसरों की क्या कमी है।

आशुतोष गोवारीकर का उद्देश्य एक हॉलीवुडनुमा भव्य मनोरंजक फिल्म बनाना था। आज विकसित टेक्नोलॉजी आपको प्रेरित करती है कि इस तरह की कहानी चुनें जिसमें भव्यता, चकाचौंध, अविश्सनीय एक्शन की गुंजाइश हो। पहली बार एआर रहमान को मुगल कथा के लिए संगीत देने का अवसर मिला है। यों भी सूफियाना संगीत उन्हें पसंद रहा है। वे अमीर खुसरो की रचनाओं का इस्तेमाल कर चुके हैं। इस फिल्म में तानसेन का पात्र होने पर रहमान को और अवसर हैं।

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