‘कल’ फुटपाथ पर बीता, आज नोबेल विजेता

चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले वैज्ञानिक मारियो कैपची ने अपना बचपन इटली की सड़कों पर यतीम के रूप में गुजारा था। उनकी मां को नाजियों ने राजनैतिक कैदी बना रखा था। कैपची ने अपने जीवन के आरंभिक दिनों में वह सब कुछ झेला, जिसके बाद कोई अपनी पढ़ाई जारी रखने की सोच भी नहीं सकता।

इटली के वरोना में 1937 में जन्मे कैपची ने बताया उस समय मेरी उम्र साढ़े तीन साल की थी। वे नौ साल की उम्र तक सड़कों पर बदहवास घूमते रहे। जैसे-तैसे दो वक्त की रोटी मिली। इतना ही नहीं इसके लिए कई बार कानून भी तोड़े। उस समय इटली की सड़कों पर सैकड़ों बच्चे थे। इनमें से कुछ ऐसे भी बदनसीब रहे जो जिंदगी से हार बैठे। नाजी कैंप से रिहा होने के बाद कैपची की मां दर-दर की ठोकरें खाती रहीं।

एक साल बाद वह इटली के एक अस्पताल में अपने बेटे कैपची से मिलीं। लगातार भूखे रहने के कारण कैपची की हालत खराब हो गई थी और उसे एक अनाथालय में भर्ती कराया गया था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कैपची और उसकी मां अमेरिका चले आए। उन्होंने बताया कि उनके मामा पहले से ही अमेरिका में थे। वे भौतिक वैज्ञानिक के रूप में काम कर रहे थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर कैपची का रुझान विज्ञान की ओर हुआ।

वर्तमान में ऊटा विश्वविद्यालय में ह्यूमन जैनेटिक्स के प्रोफेसर कैपची का कहना है कि इटली की सड़कों पर बिताए दिनों ने उन्हें लगातार मजबूत बनाया और जिंदगी से लड़ने की हिम्मत दी।

कैपची ने बताया ‘जीन टारगेटग टेक्नालॉजी’ को कई वैज्ञानिक खारिज कर चुके थे, लेकिन मुझे लगा कि अभी इसमें काफी कुछ किया जा सकता है। नोबेल पुरस्कार जीतने पर मुस्कराते हुए कैपची ने कहा ‘मेरा अनुभव बताता है कि हमें नए लोगों को अवसर देना चाहिए, क्योंकि कोई नहीं जानता कि कौन किससे कितना आगे निकल सकता है।’

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